उडलिखान मेरा गाव जो अब अपना सा नहीं लगता है।
काफी समय के बाद कुछ मन किया अपने गाव के बारे मैं सोचने का, दीवाली के इस लम्बे वीकेंड ने अचानक गाव कि याद ताजा कर दी, चौखुटिआ से ढाई मील कि दुरी पर स्थित यह गाव , काफी छोटा है सिर्फ सोलह मवास का यह गाव , इसलिए भी ऐतहासिक है क्योकि यह बिलकुल लखनपुर मंदिर पहाड़ कि नीव पर स्थित है, लेकिन मैं जो बात यहाँ पर कहने जा रहा हु , वह ऐतहासिक न होकर समाज पर केंद्रित है, वह बदलते समाज पर केंद्रित है , और बदलते हुए समय ने कैसे इस गाव को अंधकार के गर्त मैं दाल दिया है!
खेती मुख्य जीविका का साधन कभी था, अब सब सबल लोग खेती से काफी दूर निकल चुके है , जो कि इस राज्य के हर एक गाव कि कहानी है, जितने भी लोग आज गाव मैं रह रहे है , उसका मुख्य कारण बाहर कोई नौकरी -चाकरी न होना या , यही पर व्यवसाय या नौकरी होना खास कारण है, गाव मैं किसी प्रकार का सामाजिक मेल मिलाप, प्यार या भाई चारा शुन्य के बराबर है, एक दूसरे से बड़े बन ने कि होड़, एक दूसरे से द्वेष रखने कि होड़ मैं यह गाव काफी आगे निकल गया है , क्योकि आपसी भाई चारा गायब है इसलिए इस युग मैं भी इस गाव मैं पीने के पानी के लाले पड़े हुए है , घर - घर मैं देवता का वास है , और हर घर को पितरो न परेशान किया हुआ है, पितरो को आज के परिपेक्ष मैं उतनी इज्जत नहीं बक्शी जाती , आज पितर यहाँ एक परेशां आत्मा बनकर यहाँ के लोगो को परेशान करते नजर आते है, यह कहा जाता है, मैंने कभी इसको खुद महसूस नहीं किया ..!
हर घर मैं जागर होती है , सुबह शाम और रात, लगभग जब कभी कोई बहार से यहाँ आता है , वह सिर्फ एक कारण से और ये जागर उसे बुला के लाती है , फिर वही देवता का मनमुटाव, जगरिया जी कि शराब पीकर देवता नाचना , और फिर वही नयी तारिक, समाधान कुछ नहीं, आपस मैं अब देवता फिर कोशिश कर रहे है कि सब एक जैसा हो जाये परन्तु सब अभी भी वैसा ही है ...आपसी द्वेष के कारण खुश नहीं है, ..शायद यही कारण हो देवता के नाखुश होने का , परन्तु मानव कहा यह सब कुछ देख पाता है, वह तो डूबा है पैसे के नशे मैं, अहंकार मैं ..इसलिए इस गाव मैं अब खुशियो मायना ही बदल गया है और अब यह गाव अपना सा नहीं लगता है।!
काफी समय के बाद कुछ मन किया अपने गाव के बारे मैं सोचने का, दीवाली के इस लम्बे वीकेंड ने अचानक गाव कि याद ताजा कर दी, चौखुटिआ से ढाई मील कि दुरी पर स्थित यह गाव , काफी छोटा है सिर्फ सोलह मवास का यह गाव , इसलिए भी ऐतहासिक है क्योकि यह बिलकुल लखनपुर मंदिर पहाड़ कि नीव पर स्थित है, लेकिन मैं जो बात यहाँ पर कहने जा रहा हु , वह ऐतहासिक न होकर समाज पर केंद्रित है, वह बदलते समाज पर केंद्रित है , और बदलते हुए समय ने कैसे इस गाव को अंधकार के गर्त मैं दाल दिया है!
खेती मुख्य जीविका का साधन कभी था, अब सब सबल लोग खेती से काफी दूर निकल चुके है , जो कि इस राज्य के हर एक गाव कि कहानी है, जितने भी लोग आज गाव मैं रह रहे है , उसका मुख्य कारण बाहर कोई नौकरी -चाकरी न होना या , यही पर व्यवसाय या नौकरी होना खास कारण है, गाव मैं किसी प्रकार का सामाजिक मेल मिलाप, प्यार या भाई चारा शुन्य के बराबर है, एक दूसरे से बड़े बन ने कि होड़, एक दूसरे से द्वेष रखने कि होड़ मैं यह गाव काफी आगे निकल गया है , क्योकि आपसी भाई चारा गायब है इसलिए इस युग मैं भी इस गाव मैं पीने के पानी के लाले पड़े हुए है , घर - घर मैं देवता का वास है , और हर घर को पितरो न परेशान किया हुआ है, पितरो को आज के परिपेक्ष मैं उतनी इज्जत नहीं बक्शी जाती , आज पितर यहाँ एक परेशां आत्मा बनकर यहाँ के लोगो को परेशान करते नजर आते है, यह कहा जाता है, मैंने कभी इसको खुद महसूस नहीं किया ..!
हर घर मैं जागर होती है , सुबह शाम और रात, लगभग जब कभी कोई बहार से यहाँ आता है , वह सिर्फ एक कारण से और ये जागर उसे बुला के लाती है , फिर वही देवता का मनमुटाव, जगरिया जी कि शराब पीकर देवता नाचना , और फिर वही नयी तारिक, समाधान कुछ नहीं, आपस मैं अब देवता फिर कोशिश कर रहे है कि सब एक जैसा हो जाये परन्तु सब अभी भी वैसा ही है ...आपसी द्वेष के कारण खुश नहीं है, ..शायद यही कारण हो देवता के नाखुश होने का , परन्तु मानव कहा यह सब कुछ देख पाता है, वह तो डूबा है पैसे के नशे मैं, अहंकार मैं ..इसलिए इस गाव मैं अब खुशियो मायना ही बदल गया है और अब यह गाव अपना सा नहीं लगता है।!
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