सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Uttrakhand ko bachane ki chaunitiya..!

उत्तराखंड को बचाने  की चुनौतिया !

बीस जुलाई की शाम को दिल्ली के गाँधी पीस फाउंडेशन मैं एक सेमिनार का आयोजन किया गया , जिसमे "उत्तराखंड को बचाने की  चुनौतिया " के  बारे काफी गहन तरीके  से विचार- विमर्श हुआ, यह सेमिनार समय के अनुसार शाम के 5 .3 0 बजे शुरू हुआ, और दिल्ली ने भी इस दिन वही मौसम महशूश  किया जो की उत्तराखंड पिछले एक महीने से मह्शूश  कर रहा है, दिनभर की बारिश ने पुरे दिल्ली शहर मैं पानी भर दिया ,  और यातायात बिलकुल कछुवे की तरह  खिसक रहा था, परन्तु गाँधी पीस फाउंडेशन की भीड़ से बिलकुल ऐसा नहीं लगा क्योकि वहा  पर , उत्तराखंड के शुभचिंतक एक बड़ी मंत्रणा कर रहे थे.
क्योकि विषय अभी हाल के आपदा से प्रेरित था इसलिए इसमें प्रवक्ता के रूप मैं वही लोग थे , जो इस विषय के ज्ञाता रहे है , और जिन्होंने अपना जीवन पर्यावरण के शोध मैं लगाया है. इसमें मुख्य वक्ता श्रीमान हिमांशु ठक्कर जी, वयोवृद्ध पर्यावरण विध , प्रोफेसर k .s .वल्दिया , श्रीमान शेखर पाठक एवं मशहूर आन्दोलनकारी शमशेर सिंह बिष्ट थे.  इस सेमिनार का सञ्चालन डॉ  चौधरी ने किया और इसका आयोजन उत्तराखंड पीपुल्स फोरम के द्वारा दिया गया !
हिमांशु ठक्कर जी ने सेमिनार की शुरुआत की जिसमे उन्होंने हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के रोले के बारे मैं बताया , और क्यों हाइड्रो पॉवर को इतनी महत्वता दी जाती है सरकार  के द्वारा !  भारत मैं अभी बयालीस हज़ार मेगा वाट के हाइड्रो प्रोजेक्ट्स अभी चल रहे है और सरकार वर्ष २ ० 3 2 तक इनको डेढ़ लाख मेगावाट तक पहुचने की कोशिश कर रही है , अभी तक चल रहे प्रोजेक्ट्स का विश्लेष्ण किया जाय तो , नवाशी प्रतिशत हाइड्रो प्रोजेक्ट्स टारगेट से कम बिजली का उत्पादन कर रहे है, पचास प्रतिशत उनमे से ऐसे है जो टारगेट का पचास प्रतिशत से भी कब बिजली उत्पादन कर रहे है ! हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का USP है की उनकी पिकिंग शमता काफी तेज होती है जिसके कारण हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की जरुरत काफी बढ़ रही है, ये हाइड्रो प्रोजेक्ट्स जहा भी लगे है वह के निवासियों को कभी इन्होने बिजली नहीं दी है, जिसका उधारण  उन्होंने bhakra नंगल का का दिया ! उत्तराखंड मैं अभी तक अठानवे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स ऑपरेशनल है जिनमे 3 6 0 0 मेगवाट बिजली बनती है और इकतालीस अभी बन रहे है और लगभग दो सौ अभी प्लांड है. ! जैसा की आम विचार है की रन ऑफ़ the  रिवर परियोजना काफी ठीक है , यह विचार काफी गलत है क्योकि इसमें भी उतने ही खतरे है जैसा की आम प्रोजेक्ट्स मैं है.!सब मैं बांध और  स्टोरेज की  जरुरत होती है। टनल की भी आवश्यकता होती है, उत्तराखंड सदा से ही landslide  ,बाढ प्रोन रहा है , और जबसे एक्स्प्लोसिवेस का प्रयोग बढ़ा है उसने पहाड़ को और कमजोर कर दिया है. ! सन 2 0 0 0  से 2 0 1 0  तक 1 6 0 0 हेक्टेयर जमीन की सरकार वन हटाने की अनुमति दी थी , जो की एक अन्य कारण  है बाढ़ आने का ! नदी को टनल मैं डालकर हम नदी को मार रहे है. उन्होंने बताया ही श्रीनगर की त्रश्दी का सबसे बड़ा कारण  GVK के द्वारा बनाया गया बांध है , उन्होंने  सत्रह जून को बांध के द्वार खोलने से पूरा , गाद , स्लिट और बोउल्देर्स ने श्रीनगर सहर को डूबा दिया , वह अभी भी मलबे के नीचे मकान दबे हुए है और यह मलबा GVK के द्वारा अवैध तरीके अलकनंदा नदी मैं फैका गया था जो श्रीनगर मैं  देखा जा रहा है ! इसपर GVK पर केस होना चाहिए ! श्रीनगर को बांध मिस  मैनेजमेंट के कारण त्राश्दी का दर्द सहना पड़ा !उन्होंने NDRF को स्थानियों निवासियों का होने पर भी जोर दिया ! सरकार और पुजीपतियों की मिली भगत ने इस आपदा को और बड़ा कर दिया !
डॉ खरक सिंह वल्दिया , जो की काफी नामी गिरामी हस्ती है , उन्होंने हमें एक प्रेजेंटेशन के द्वारा बताया है आखिर  की आपदा वैज्ञानिक कारण  क्या है , कैसे हिमलाय इन  अपदाओ से सदा झुझता रहा है, आपदा नयी बात नहीं है इन जगहों की लिए , लेकिन क्योकि अब नदी के स्थान पर भवनों का निर्माण होने से आपदा ने अपने  अधिकार को  माँगा है , केदार घटी मैं सन सत्तर तक सिर्फ एक मंदिर और एक दो दुकानों हुआ करती थी आज वहा होटल्स , गेस्ट हाउसेस, रिसॉर्ट्स है , और नदी की बहाव क्षेत्र मैं निर्माण से नदी अपने साथ सब बहा कर ले गयी, लेकिन केदार मंदिर को उतना नुक्सान नहीं हुआ क्योकि , हमारे पुरुखो ने जब इसका निर्माण किया था तो उसको बहाव क्षेत्र से अलग बनाया थ! नदी का बहाव क्षेत्र हम पिछले सौ सालो मैं जहा  जहा नदी बही है उस से अनुमान लगा सकते है , और उस बहाव क्षेत्र मैं किसी भी प्रकार का निर्माण मौत को दावत देना है.
प्रोफ शेखर पाठक ने बताया की उत्तराखंड मैं इस प्रकार की आपदाए सदा आती रही है लेकिन इस बार उसका कार्य क्ष्तेत्र केदारनाथ रहा जहा की जान और माल की काफी क्षति हुए है जिसके कारन यह काफी भयावह हो गयी है, कारण  आप सभी जानते है, एक ऐसा विकाश जो विनाश की और ले गया है उत्तराखंड को, उन्होंने बताया की 1 8 8 0  मैं नैनीताल मैं भी आपदा आई थी जिसमे एक सौ एक्वावन लोग मरे थे, लेकिन उसके बाद अंग्रेजो ने ऐसे इंतजाम किये की फिर दुबारा वह काफी समय तक आपदा नहीं आई, लेकिन आज वही विकास वहा  भी दिख रहा है , और इसी प्रकार का मंजर वह भी देखने को मिल सकता है. उन्होंने चार बाते सुझायी  सबसे पहले रिहैबिलिटेशन , इस आपदा का विश्लेषण ,  हिमालयी क्षेत्र मैं जीवन  एवं संसाधनों का विकेन्द्रिकर्न !
शमशेर सिंह बिष्ट , जी ने अपनी बात रखी , और उन्होंने इस बात बार जोर दिया की आज के समय मैं कोई भी सरकार , प्रशाशन से सवाल क्यों नहीं पूछता , पूरा जीवन अन्दोलनो के हवाले करने वाले इस नायक की आवाज मैं दर्द साफ़ दिखाई दिया, उम्र एवं शारीरिक क्षमता ने उनके हौसले पर कोई असर नहीं छोड़ा था आज भी उनका हौसला उतना ही बुलंद था , उत्तराखंड मैं जोशीमठ ब्लाक मैं 2 0 0 6  से 2 0 1 1  तक 2 0 6 3 2   किलोग्राम डायनामाइट और एक लक एकहत्तर किलोग्राम देतोनतोर का इस्तेमाल किया गया है जिस से पहाड़ कमजोर हुआ है , और यही कारन है जो आपदा लेकर आते है , समय है हम सब को साथ मिलकर खड़े होने की और इस विनाश के विकास को रोकने की !
सभा का समापन चारू तिवारी जे के वोट ऑफ़ थैंक्स के साथ हुअ.!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए।

  5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए। परिचय भारत में, विशेष रूप से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जैसे क्षेत्रों में, रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहनों के लिए अनिवार्य हो गए हैं। यह कदम वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण नियमों को लागू करने के प्रयासों का हिस्सा है। हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (एचएसआरपी) के तहत शुरू किए गए ये स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दर्शाते हैं, जिससे अधिकारियों को उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों की पहचान और नियमन में आसानी होती है, खासकर जब वायु गुणवत्ता खराब हो। यह लेख रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर के उद्देश्य, महत्व और भारत में इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझाता है। रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर का उद्देश्य रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दृष्टिगत रूप से दर्शाते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को वाहनों के उत्सर्जन की निगरानी में मदद मिलती है। ये स्टिकर एचएसआरपी सिस्टम का हिस्सा हैं, जो 2012-13 में शुरू हुआ और दिल्ली में अप्रैल 2019 तक सभी वाहनों के लिए अनिवार्य हो गया। य...