मेरा गाँव मुझे याद आता है, जब भी मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ बचपन के वो दिन, तो आँखों के सामने वो पूरा गाँव नजर आता है, वो बचपन की शरारते, वो गाँव के दगरियो के साथ पुरे दिन समय बिताना, कभी रामगंगा मैं नहाना, मच्छी मारना, कभी खूब मच्चिया लेकर घर आना और कभी बिना मच्छी के भी दिन गुजरना, गौ -बल्दो का ग्वाला रहना पुरे दिन भर , और जंगल मैं ही काफल खाना, शाम को बरेती जाना, खूब बंद मैं नाच करना और शुबह २-३... बार पिठ्या लगाकर जेब्खर्ची के लिए पैसे इकठ्ठा करना, कितना प्यार था साथियों मैं , कितना प्यार था गाँव मैं, लेकिन अब जब सोचता हूँ उस वक़्त के बारे मैं काफी दुःख होता है की तो वो समय अब न रहा और न ही रहे वो लोग , जिनके मन मैं एक दुसरे के लिय प्यार पनपता था, अब हालत ये है, जो साथी थे, जो संगी थे वोही अब दुश्मन से लगते है, भाई अब भाई नहीं रहे , चाचा अब चाचा नहीं रहे, ताऊ अब ताऊ नहीं रहे , अब तो गाँव -गाँव सा नहीं लगता उस प्यार को लगता है हम कही दूर छोड़ आये है, अब तो हम उन सबका हाथ लगा हुआ भी नहीं खाते , क्योकि मन मैं अब एक दुसरे के लिए इतनी कडवाहट जम गयी है की, एक दुसरे का हाथ का लगा अब खा नहीं सकते. वो हसी, वो चंचलता , वो अपनापन कही गम हो गया है, और अब सिर्फ दुश्मनी रह गयी है जिस के सहारे पूरी जिंदगी कटेगी, देवता के नाम पर नफ़रत पैदा कर रहे है हम एक दुसरे के लिए, क्या देवता ने कभी हमसे आकर कहा की कार्लो एक दुसरे से दुश्मनी , इस से भला हो जायेगा हमारा.........आज जब अपने गाँव के ये हालत देखता हु की १९ मवास मैं से ५ मवास एक दुसरे के हाथ का पानी नहीं पे सकते , तो फिर कहा सामाजिक काम मैं शामिल होना , कहा प्यार का बढ़ना , सब ख़तम सा लगता है...इसलिए मन मैं सोच कर सबसे प्यार कर लेता हूँ ....पता नहीं कब इसे वास्तविकता मैं जाहिर कर पाउँगा...डरता हु ..देवता फिर नाराज न हो जाये....और इसी उलझन मैं एक गाँव का खत्म हो गया.......!
पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या दादी जी के आँचल मैं पलता और बड़ा होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़ मैं लगे होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर बहुत एहसान है , इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के जीवन को सहारा दिया है ! आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़मा...
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