सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Mera gaon..merji najar se...!

मेरा गाँव मुझे याद आता है, जब भी मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ बचपन के वो दिन, तो आँखों के सामने वो पूरा गाँव नजर आता है, वो बचपन की शरारते, वो गाँव के दगरियो के साथ पुरे दिन समय बिताना, कभी रामगंगा मैं नहाना, मच्छी मारना, कभी खूब मच्चिया लेकर घर आना और कभी बिना मच्छी के भी दिन गुजरना, गौ -बल्दो का ग्वाला रहना पुरे दिन भर , और जंगल मैं ही काफल खाना, शाम को बरेती जाना, खूब बंद मैं नाच करना और शुबह २-३... बार पिठ्या लगाकर जेब्खर्ची के लिए पैसे इकठ्ठा करना, कितना प्यार था साथियों मैं , कितना प्यार था गाँव मैं, लेकिन अब जब सोचता हूँ उस वक़्त के बारे मैं काफी दुःख होता है की तो वो समय अब न रहा और न ही रहे वो लोग , जिनके मन मैं एक दुसरे के लिय प्यार पनपता था, अब हालत ये है, जो साथी थे, जो संगी थे वोही अब दुश्मन से लगते है, भाई अब भाई नहीं रहे , चाचा अब चाचा नहीं रहे, ताऊ अब ताऊ नहीं रहे , अब तो गाँव -गाँव सा नहीं लगता उस प्यार को लगता है हम कही दूर छोड़ आये है, अब तो हम उन सबका हाथ लगा हुआ भी नहीं खाते , क्योकि मन मैं अब एक दुसरे के लिए इतनी कडवाहट जम गयी है की, एक दुसरे का हाथ का लगा अब खा नहीं सकते. वो हसी, वो चंचलता , वो अपनापन कही गम हो गया है, और अब सिर्फ दुश्मनी रह गयी है जिस के सहारे पूरी जिंदगी कटेगी, देवता के नाम पर नफ़रत पैदा कर रहे है हम एक दुसरे के लिए, क्या देवता ने कभी हमसे आकर कहा की कार्लो एक दुसरे से दुश्मनी , इस से भला हो जायेगा हमारा.........आज जब अपने गाँव के ये हालत देखता हु की १९ मवास मैं से ५ मवास एक दुसरे के हाथ का पानी नहीं पे सकते , तो फिर कहा सामाजिक काम मैं शामिल होना , कहा प्यार का बढ़ना , सब ख़तम सा लगता है...इसलिए मन मैं सोच कर सबसे प्यार कर लेता हूँ ....पता नहीं कब इसे वास्तविकता मैं जाहिर कर पाउँगा...डरता हु ..देवता फिर नाराज न हो जाये....और इसी उलझन मैं एक गाँव का खत्म हो गया.......!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरी दादी - मेरी आदर्श !!!

पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या  दादी जी के आँचल मैं पलता और  बड़ा  होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से  बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़  मैं  लगे  होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी  यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके  बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर  बहुत एहसान  है ,  इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के  जीवन को सहारा दिया है ! आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं  हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़मा...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

आलू मटर ने पहुचाया दिल्ली !

                               (फोटो आभार   चौखुटिया गेवाड विकास परिषद्) यह बात उन दिनों की है जब मैं चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं छठी कक्षा का छात्र था, सोनगांव स्कूल से पांचवी पास करके चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं प्रवेश लिया था, चौखुटिया मुझ गाँव के स्कूल से पढ़े के लिए बिलकुल शहर सा था, सोनगांव के स्कूल के आस पास कोई दुकान थी , और न ही कुछ खाने को मिलता था, परन्तु चौखुटिया इसके विपरीत एक बड़ा सा बाजार था, उस ज़माने मैं फ़ास्ट फ़ूड के तौर पे आलू- मटर सबसे हिट डिश थी, आलू-मटर  संग रायता मेरा पसंदीदा डिश थी , अब पापा दिल्ली रहते थे, और गाँव मैं अम्मा जी घर देखती थी, और तब जेब -खर्ची नाम की कोई भी खर्ची नहीं होती थी, सिर्फ दाल-भात खाओ या फिर मदुए की रोटी और साग, बस यही सब कुछ खाना पड़ता था !  बाजार मैं स्कूल जाते वक़्त रोज आलू-मटर अपनी ओर बुलाते थे, परन्तु पैसे न होने के कारण मैं मन मसोस कर रह जाता था, लेकिन इस समस्या का हल भी जल्दी निकल गया , मेरे कक्षा के कुछ साथी मेरे मित्र बन गए जिन्होंने मुझे अपन...