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उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही

  उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही काफी समय बाद मुझे  अल्मोड़ा भवन  जाने का मौका मिला और मान्यवर प्रताप सिंह साही जी से मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं अपने परिवार के किसी बड़े सदस्य से मिल रहा हूँ। वह शख्स जिसने अपनी जिंदगी के 22 साल उत्तराखंड आंदोलन के लिए समर्पित कर दिए, जेल की यातनाएं सहीं, और अंततः 9 नवंबर 2000 को हमारे सपनों का उत्तराखंड राज्य हमारे सामने आया। प्रताप सिंह साही जी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के बग्वाली पोखर स्थित डोटल गाँव में हुआ। बचपन से ही उनमें अपने समाज और पहाड़ के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, और वर्ष 1976 में वे दिल्ली आ गए। उस समय इमरजेंसी का दौर था, लेकिन अपने दिल में पहाड़ के प्रति प्रेम और अलग उत्तराखंड राज्य का सपना वे कभी नहीं छोड़े। 1977 में सरकारी विभाग में नौकरी मिली, पर नौकरी के साथ-साथ उत्तराखंड आंदोलन की जड़े उनके मन में धीरे-धीरे गहरी होती गईं। 1978 में दिल्ली के वोट क्लब में आयोजित एक ऐतिहासिक रैली में वे शामिल हुए, जहाँ उन्होंने उत्तराखंड के कई प्रमुख नेताओं जैसे प्रताप सिंह ने...
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धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

उत्तराखंडी गांव में ग्राम प्रधान का चुनाव: हंसी-मजाक और गंभीरता का मेल

  उत्तराखंडी गांव में ग्राम प्रधान का चुनाव: हंसी-मजाक और गंभीरता का मेल उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में ग्राम प्रधान का चुनाव कोई साधारण बात नहीं है। ये तो ऐसा उत्सव है, जिसमें पूरा गांव एक साथ आता है—कभी गपशप के लिए, कभी बहस के लिए, और कई बार तो सिर्फ मुफ्त की चाय और समोसे के लिए! लेकिन इस मजेदार माहौल में एक गंभीर जिम्मेदारी भी छिपी है—ऐसा ग्राम प्रधान चुनना, जो हमारे गांव को तरक्की की राह पर ले जाए। आज मैं, एक उत्तराखंडी गांववासी, आपको ग्राम प्रधान के चुनाव की प्रक्रिया, उम्मीदवार में क्या गुण देखने चाहिए, और कुछ मजेदार तरीकों के बारे में बताऊंगा, जिनसे हमारे गांववाले (हालांकि गलती से!) अपने वोट बेच देते हैं। तो चलिए, शुरू करते हैं—पहाड़ी ढोल की थाप के साथ! ग्राम प्रधान का चुनाव: प्रक्रिया समझिए ग्राम प्रधान का चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जो पंचायती राज व्यवस्था के तहत होती है। उत्तराखंड में ग्राम पंचायतें गांवों की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई हैं, और ग्राम प्रधान इस इकाई का मुखिया होता है। अब ये प्रक्रिया कैसे काम करती है, इसे समझते हैं: नामांकन : सबसे पहले, जो लोग ग्राम प...

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

चौखुटिया का अमर बरगद: आस्था और विरासत का प्रतीक

  चौखुटिया का अमर बरगद: आस्था और विरासत का प्रतीक उत्तराखंड की शांत गेवाड़ घाटी में बसा चौखुटिया, जहां रामगंगा नदी के किनारे अगनेरी मंदिर की पवित्र भूमि पर एक बरगद का पेड़ पिछले पचास से अधिक वर्षों से खड़ा है, वह केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और विरासत का जीवंत प्रतीक है। यह बरगद, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा से देखते हैं, अगनेरी मंदिर के प्रांगण में और रामगंगा मंदिर के निकट, एक मूक साक्षी की तरह खड़ा है, जो न केवल समय की गति को देख चुका है, बल्कि अनगिनत प्रार्थनाओं, उत्सवों और कहानियों को अपने आलिंगन में समेटे हुए है। हिंदू संस्कृति में बरगद, या वट वृक्ष , को अमरता और दैवीय शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसकी विशाल शाखाएं, हवा में लटकती जड़ें और घना छायादार canopy इसे एक पवित्र आश्रय बनाते हैं। चौखुटिया का यह बरगद पेड़, जो अपनी जड़ों से धरती को गले लगाए हुए है, श्रद्धालुओं के लिए एक जीवंत मंदिर की तरह है। ऐसा माना जाता है कि इसके तने, जड़ों और पत्तियों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वास है। इसकी छाया में बैठकर श्रद्धालु शांति पाते हैं, और इसकी उपस्थिति उन्हें आलौकिक शक्ति का...